संघर्ष

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रविवार, 31 जुलाई 2016

***बेटी होने के ही कारण, यूँ ना मुझको मार दे माँ........

मैंने कब चाहा मुझे तू, ये सारा संसार दे माँ,
अपनी गोदी में बिठाकर, थोडा सा तो प्यार दे माँ.........
मैं अगर जन्मी हूँ बेटी, इसमें मेरी है खता क्या,
बेटी होने के ही कारण, यूँ ना मुझको मार दे माँ........
कोख में काटा गया है, मुझको करोड़ो बार मैया ,
बेटी होने की सजा ना, मुझको बारम्बार दे माँ ..........
क्यों मुझे समझो अभागी, दो घरों की लाज हूँ मैं,
तुझसे हूँ मैं, हूँ तुझी सी, पल दो पल ही दुलार दे माँ.........
नारी हो कर क्यों नारी की, व्यथा तू माँ समझ ना पाए,
मुझको फलने फूलने दे, जीवन का तू सार दे माँ..........
एक नई पीड़ी का निर्माण, मुझको ही करना है मैया,
मुझको जीवित रख के तू, स्रजन का अधिकार दे माँ.......

***********************************************************
मेरी हत्या करके मैया, एक दिन बहुत पछताएगी तू,
इस धरा को एक दिन, नारी विहीन कर जाएगी तू,
इस धरा पर फिर मनुज का, आगमन होगा तो कैसे?
कोख ही जब ना रहेगी, सन्तति कहाँ से लाएगी तू?
श्रष्टि का विस्तार सारा, तेरे मेरे दम से है माँ,
मेरी हत्या करके धरती, इंसान विहीन कर जाएगी तू,
इसलिए कहती हूँ मैया, मुझको जीवन सार दे तू,
मुझको जीवन देके मैया, रचना का अधिकार दे तू,

मंगलवार, 12 अक्तूबर 2010

माँ रखियो लाज हमारी........



जय माता की,

माँ रखियो लाज हमारी,
माँ रखियो लाज हमारी........

तू खड़ग खप्पर को धारी,
कर मैं त्रिशूल है भारी,
तू करती सिंह सवारी,
तू दुष्टों की संहारी,
माँ रखियो लाज हमारी,
माँ रखियो लाज हमारी........

है जगत जननी जग माता,
है त्रिभुवन भाग्य विधाता,
है परम शक्ति परमेश्वरी,
है करूणा निधि करूनेश्वरी,
है दुख भंजन सुखकारी,
माँ रखियो लाज हमारी........

है चंड मुंड संहारिणी,
है रक्त बीज निस्तारिणी,
है शुम्भ निशुंभ पछाडिणी,
है महिसासुर प्राण निकारिणी,
हम आये शरण तुम्हारी,
माँ रखियो लाज हमारी........

है भैरव तारा जग तारिणि,
है मुंड माल गल धारिणी,
है दुर्गा दुर्ग विनासिनी,
है नगर कोट की वासिनी,
ना भ्रकुटी तने तुम्हारी,
माँ रखियो लाज हमारी........

क्या हम अपने अंदर का, रावण मार सके हैं?....



हर साल दशहरे पर हम, रावण का पुतला है जलाते,
राम की बताई राह चलेंगे, सौ सौ बार कसम है खाते..........
राम लीला के आदर्श, क्या जीवन मैं हम उतार सके है?
क्या हम अपने अंदर का, रावण मार सके हैं?........

हममे कितनी सीतायें, राम के साथ वन गमन करेंगी,
राजसी सुख त्याग कर, काँटों का जा वरण करेंगी.........
हम सभी ढूंढते निज पत्नी मैं, पावनता गीता की,
पर हम मैं कितने राम हैं जो, उम्मीद करें सीता की......
परनारी तकने के भाव को, हम खुद मैं से क्या निकार सके हैं?
क्या हम अपने अंदर का, रावण मार सके हैं?........

जब भी भक्ति की बात है चलती, हनुमत सबको याद हैं आते,
असम्भव को भी सम्भव करते, अपना सीना चीर दिखाते,
प्रभु भक्ति की बात करो मत, पर राष्ट्र भक्ति हम कितनी दिखाते,
सत्ता जिनके हाथ मैं है, वही देश को बेच के खाते...........
सत्ता और दौलत के मदमस्तों का, हम अब तक क्या उखार सके हैं,
क्या हम अपने अंदर का, रावण मार सके हैं?........

लछमण और भारत से भाई, आज यहाँ कितनो के हैं,
कैकई से दुश्मन यहाँ पर, आज बहुत अपनों के हैं,
बात चली तो बात से ही, प्रश्न यहाँ पर उठते अनेक,
लछमण, भारत सभी चाहते हैं, पर खुद मैं ढूंढे राम ना एक.........
हममे खुद बाली, बहुतों के मन मैं, उसका क्या बिगार सके हैं,
क्या हम अपने अंदर का, रावण मार सके हैं?........

क्या हम अपने अंदर का, रावण मार सके हैं?....



हर साल दशहरे पर हम, रावण का पुतला है जलाते,
राम की बताई राह चलेंगे, सौ सौ बार कसम है खाते..........
राम लीला के आदर्श, क्या जीवन मैं हम उतार सके है?
क्या हम अपने अंदर का, रावण मार सके हैं?........

हममे कितनी सीतायें, राम के साथ वन गमन करेंगी,
राजसी सुख त्याग कर, काँटों का जा वरण करेंगी.........
हम सभी ढूंढते निज पत्नी मैं, पावनता गीता की,
पर हम मैं कितने राम हैं जो, उम्मीद करें सीता की......
परनारी तकने के भाव को, हम खुद मैं से क्या निकार सके हैं?
क्या हम अपने अंदर का, रावण मार सके हैं?........

जब भी भक्ति की बात है चलती, हनुमत सबको याद हैं आते,
असम्भव को भी सम्भव करते, अपना सीना चीर दिखाते,
प्रभु भक्ति की बात करो मत, पर राष्ट्र भक्ति हम कितनी दिखाते,
सत्ता जिनके हाथ मैं है, वही देश को बेच के खाते...........
सत्ता और दौलत के मदमस्तों का, हम अब तक क्या उखार सके हैं,
क्या हम अपने अंदर का, रावण मार सके हैं?........

लछमण और भारत से भाई, आज यहाँ कितनो के हैं,
कैकई से दुश्मन यहाँ पर, आज बहुत अपनों के हैं,
बात चली तो बात से ही, प्रश्न यहाँ पर उठते अनेक,
लछमण, भारत सभी चाहते हैं, पर खुद मैं ढूंढे राम ना एक.........
हममे खुद बाली, बहुतों के मन मैं, उसका क्या बिगार सके हैं,
क्या हम अपने अंदर का, रावण मार सके हैं?........

अब तो हम इनसान कहाएँ..........


वन्दे मातरम बंधुयों,

मन्दिर मस्जिद बहुत बनाये,
आओ मिलकर देश बनाये,
बहुत जिए हम जानवर बनकर,
अब तो इन्सां बनके दिखाएँ............

जाति और धर्म पर हमने,
युद्ध लड़े ना जाने कितने,
बहुत बहाया खूँ धरती पर,
अब प्रेम रस की गंगा बरसायें...........

दीवार लगा कर अलग कर दिया,
घर जो अपना साझा था,
अब वो वक्त आ गया है,
बीच कि ये दीवार गिराएँ...........

जोश जरूर रहे दिलों मैं,
जोश नजर आना चाहिए,
जो भी आँख उठाये वतन पर,
उस दुश्मन को मार गिराए...........

झगड़े अपने दुनिया देखि,
चल दुनिया को आज दिखाएँ,
मैं तेरे घर सींवई खाऊं,
तू मेरे घर दीप जलाये...........

आदमी रहे मगर हम,
आदमियत के पास ना गुजरे,
हम और हामी से दूर होकर,
अब तो हम इनसान कहाएँ..........

शनिवार, 9 अक्तूबर 2010

.......मैं रक्त बीज रावण हूँ........'


वन्दे मातरम बंधुयों,
आज काफी कोशिश करने के बाद भी नीद नही आ रही थी पत्नी और बच्चे शिखर जी (जैन तीर्थ ) गये हुए हैं, अकेला पन खाने को दौड़ रहा था, सोचा चलो रामलीला देख लेते हैं और चल दिए रामलीला देखने को मगर मन वहां भी नही लगा तो वापिस घर आ गया, जबरदस्ती सोने के प्रयत्न मैं अभी आँख लगी ही थी की एक विशालकाय शख्श मेरे सामने आकर खड़ा हो गया ...... कहने लगा क्यों राकेश बाबू मेरी मौत के सपने देख रहे हो ...
मैं एक दम घबरा गया, मैंने पुछा बंधुवर कौन हैं आप... वह बोला घबराओ मत मैं रावण हूँ ....... मैंने कहा रावण.... कौन रावण? मैं तुम्हे जानता नही तो तुम्हारी मौत का क्यों सोचूंगा........
वह बोला अरे मैं वही रावण हूँ जिसे प्रभु राम ने तो एक ही बार मारा था मगर तुम मुझे हर साल जलाते हो .......
मैंने कहा अच्छा तुम लंका पति रावण हो, मगर तुम्हे तो प्रभु श्री राम ने मार दिया था, फिर तुम जीवित कैसे हो .....
उसने कहा तुम लाख सर पटको राकेश बाबू मेरा खात्मा सम्भव ही नही है, उस समय पर तो मेरा नाम केवल रावण था मगर आज मेरा नाम बदल कर रक्त बीज रावण हो गया है ......
मैंने कहा रक्तबीज रावण मैं समझा नही ........
तब वह बोला मेरा दोष केवल इतना था कि मैंने श्री राम जी की पत्नी जो की वन मैं भटक रही थी को उठाया ही था....मैंने उन्हें कभी कुद्रष्टि से देखा तक नही था ....... मगर आज तो मैं हर गली, हर मोड़ पर, भरे समाज से रोजाना सैकड़ों सीताओं का हरण करता हूँ......केवल हरण ही क्यों करता हूँ ......... उनके साथ बलात्कार भी करता हूँ ........ और जरूरत पड़ने पर उनको मार भी देता हूँ ....... क्या कर लिया तुमने मेरा ......... यही क्यों आज मैं संसार के अधिकतम मनुष्यों की आत्माओं पर अपने कब्जा जमा चूका हूँ ......... मेरे काल मैं एक मात्र काण्ड हुआ था ....... सीता हरण काण्ड ........मगर आज तो मैं नित नये काण्ड कर रहा हूँ ...... याद दिलाऊं क्या ?
मैं बेहद घबराया हुआ था कुछ बोल ना सका ....... मुझे चुप देख कर वह आगे बोला ........
क्या बोफोर्स कांड, चारा घोटाला कांड, पनडुब्बी कांड, प्रतिभूति कांड, चीनी घोटाला कांड, तेलगी कांड, निठारी कांड, नित नये सेक्स कांड, तहलका कांड, चन्द्र स्वामी कांड, और अनेकानेक कांड जो सम्भवत मुझे याद भी नही आ रहे हैं ........ हाँ एक ताजा ताजा कांड याद दिलाता चलूँ .........कामन वैल्थ घोटाला कांड....... क्या कर लिया तुमने अब तक ? और क्या कर लोगे आगे भी मेरा ?
इस रावण कि बातें सुनकर दिमाग सन्न रह गया था मुंह से बोल फूट नही रहे थे.......वह फिर बोला .......
मुझे मारना अब असम्भव है .... मैं रक्तबीज रावण हूँ मेरा रक्त जहां जहां गिर रहा है अनेकानेक रावण पैदा हो रहे हैं ....... मैं सबसे पहले राजनेताओं के खून मैं जाकर घुसा....... वो जाते ही गद्दी से ऐसे चिपकते हैं जैसे भैंस के शरीर से जोंक ....... ये अपनी गद्दी बचाने के लिए कभी धर्म को खतरे मैं बताते हैं, कभी भाषा जाति या देश को और ये जब तक तुम्हारे शरीर से सम्पूर्ण खून निचोड़ नही लेते तुम्हे छोड़ेंगे नही ......
फिर मैं धर्म गुरूओं के शरीर मैं प्रवेश कर गया.... क्योंकि मैं जानता हूँ मेरे बजूद के लिए इनका बजूद अति आवश्यक है ..........
राम और रावण के उस युद्ध को लोगों ने सत्य और असत्य का युद्ध करार दिया था ....... मगर आज तो ये धर्म गुरू जानते हुए भी केवल असत्य और असत्य का युद्ध लोगों को लड़ा रहे हैं...... मैं भली भांति जानता था कि ईस्वर एक है.... और मैं तो अपनी गलतिओं के प्रायश्चित के लिए उस युद्ध को लड़ रहा था, ये धर्म गुरू भी जानते हैं कि ईस्वर एक है ...... फिर भी ये तुम्हे आपस मैं लड़ा रहे हैं ......... ये कभी कहते हैं मन्दिर खतरे मैं है ........ कभी कहते हैं मस्जिद खतरे मैं है ...... कभी धर्म पर खतरा बताते हैं ..... कभी इस्लाम खतरे मैं है .........मैं इन नये नारों मैं सदैव जीवित रहूँ ....... कुछ नही बिगाड़ सकते तुम मेरा......क्या कर लिया हैं इन नेताओं और धर्म गुरूओं का तुमने .......
मैं बेहद घबराया हुआ था........ मुंह है शब्द निकलने को तैयार ही नही थे ........ तभी मुझे याद आया रामायण के ही अनुसार रावण महा विद्वान था..... उसके अंतिम समय प्रभु श्री राम ने लछमण को राजनीती का ज्ञान लेने के लिए रावण के पास भेजा था और रावण ने लछमण को निराश नही किया था....... मैं हिम्मत करके रावण से बोला ....... आपको महा विद्वान कहा गया है....
आपने लछमण को राजनीती का ज्ञान दिया था.. आप तो स्वर्ग जा चुके हैं ........ क्या कोई ऐसा रास्ता बता सकते हैं ..... जिससे हमे आपसे मुक्ति मिल सके ............
तब रावण बोला बहुत चालक है बच्चे ....... अरे राम ने तो मेरी मौत का तरीका विभीषण से पुछा था ......और तुम मुझसे ही मेरी मौत का तरीका पूछ रहे हो ........ चलो पूछ रहे हो तो मैं तुझे विभीषन बनकर अपनी मौत का तरीका बता रहा हूँ ..... क्योंकि मैं जानता हूँ तुम मुझे मार नही सकते ......... इसलिए बता रहा हूँ कि तुम वह कर ही नही सकते ........
मैंने कहा आप बताइए तो सही मैं कोशिश करूंगा .........
तब रावण बोला सुनो ...... मेरी नाभि मैं एक अम्रत कलश था उसके ही सूखने पर श्री राम का मुझे मारना सम्भव हो सका था ...... आज वह अम्रत कलश मैं तुम सभी के शरीर मैं ....... काम, क्रोध, मद, लोभ और लालच के रूप मैं डाल चुका हूँ ....... अगर सम्भव है तो इस अम्रत कलश को सुखा कर दिखाओ ........ मैं तुम सबके अंदर व्याप्त हो चुका हूँ ....... पहले अपने अंदर का रावण मार कर दिखाओ .........
क्यों जलाते हो हर साल मुझको,
पहले अपने अंदर से मुझे तुम जलाओ,
तुम मैं कही कोई राम नही है,
गर हिम्मत है राम बनके दिखाओ........
और रावण अट्टहास करते हुए चला गया ....... मेरी नींद खुल गई देखा सवेरा हो चला था ..... रावण का वो सुलगता सवाल अब तक मेरे दिमाग मैं है...... क्या हम अपने अंदर का रावण मार सकेंगे ?

गुरुवार, 7 अक्तूबर 2010

तू मुझसे और मैं तुझसे हूँ, हम मैं आखिर फर्क है क्या ?



अलग हमारे मजहब, बेशक धर्म हमारे जुदा जुदा,
मैं मन्दिर मैं सर झुकाऊं, तू काबे मैं करता सजदा,
पर तुझ मैं और मुझे मैं यारा, खून तो केवल लाल ही है,
फाकों से मैं भी मरता हूँ, भूख से तू भी बेहाल ही है,
यहाँ सदा ही साझी रही, तेरी मेरी ईद दीवाली,
तुझ मैं मुझ मैं कब फर्क करे, तेरे मेरे बाग का माली,
कब वायु ने जीवन देने मैं, किया यहाँ पर तेरा मेरा,
सूरज से मेरा घर रोशन, वही तेरे घर किया नया सवेरा,
मैं भी माँ के गर्भ रहा, और तू भी माँ के गर्भ मैं खेला,
एक ही राह से आकर हमने, देखा ये दुनिया का मेला,
तू गला काटना चाहता मेरा, काट मगर इतना तो बता,
तू मुझसे और मैं तुझसे हूँ, हम मैं आखिर फर्क है क्या ?

सोमवार, 27 सितंबर 2010

क्या ये सम्भव नही की हम राम जन्म भूमि पर प्रभु श्री राम को केन्द्रित कर एक सर्व धर्म पूजा स्थल का निर्माण कर सके




वन्दे मातरम दोस्तों,
अयोध्या मैं राम मन्दिर का मामला करोड़ों भारत वासियों की भावना से जुडा है, राम हमारी आस्था व श्रद्धा के प्रतीक हैं, पिछले साठ साल से ये मामला कोर्ट मैं विचाराधीन भी है, कई बार सरकारे बदल गई, न्यायाधीश भी बदल गये, देश ने इस प्रकरण के चलते भयंकर खून खराबा भी देखा है,
ना तो कभी कोर्ट ही इस पर कोई ठोस फैसला ले सका है, ना ही किसी भी सरकार ने इस पर कभी वास्तविक पहल की है, भाजपा व कांग्रेस सहित सभी दलों के ही लिए ये मामला केवल वोट बेंक का मामला बन कर रह गया है, आज फिर इस पर अदालत ने अपना फैसला सुनाना है मगर लगता नही है की आज भी कोई फैसला आएगा..........
हिन्दू धर्म के केंद्र मै त्याग और दया की भावना रही है........ तो क्या हम राम जन्म भूमि पर भगवान राम के अतिरिक्त और कुछ नही सोच सकते हैं? ............ क्या ये सम्भव नही की हम राम जन्म भूमि पर प्रभु श्री राम को केन्द्रित कर एक सर्व धर्म पूजा स्थल का निर्माण कर सके जहां सभी धर्मों के अनुयाई पूजा कर सके? क्या ऐसा होने पर प्रभु श्री राम की महिमा मै कोई कमी आ जायेगी? ....... मेरा तो मानना है की ऐसा होने पर राम जन्म भूमि को एक अंतर्राष्ट्रीय पूजा स्थल होने का गौरव प्राप्त होगा......
मगर मैं जानता हूँ की ऐसा होने नही दिया जायेगा....... ऐसा नही है की इस पर देश के लोगों को कोई आपति होगी..... बल्कि सत्ता और धर्म के ठेकेदार ऐसा होने नही देंगे क्योंकि ऐसा होने पर उनकी दुकानदारी बंद हो जाएगी उसका क्या होगा

रविवार, 26 सितंबर 2010

पेट पालने की खातिर, कोई पेट मैं पलते देखा है,


चिराग जलाने की कोशिश,
घर हमने जलते देखा है,
पेट पालने की खातिर,
कोई पेट मैं पलते देखा है,

भूखी माँए रोते बच्चे,
तन नंगा और मन नंगा,
एक दिन के चावल को ही,
हो जाता है बदन नंगा,
इस युग मैं हर मोड़ पे हमने,
सीता को हरते देखा है,

खुश दिख कर यहाँ करने पड़ते,
बदन के सौदे रातों मैं,
बदन के लालची भेडिये,
रहते सदा ही घातों मैं,
यहाँ द्रोपदी को चीर हरण,
खुद अपना करते देखा है,

सोने वाले सो नही पते,
रात यहाँ सो जाती है,
जग की जन्म देनी माँ,
खुद गर्त मैं खो जाती है,
पेट की खातिर खुद ही हमने,
खुद को छलते देखा है,

चिराग जलाने की कोशिश,
घर हमने जलते देखा है,
पेट पालने की खातिर,
कोई पेट मैं पलते देखा है,


पेंटिंग - गुस्ताव किल्म्ट

सोमवार, 13 सितंबर 2010

पूर्व डी एस प़ी सुरेश मूलकर वार करा सकते हैं मुझे नक्सलाईट बता कर मेरा एन काउन्टर

वन्दे मातरम दोस्तों,
मैं कुछ समय से छत्तिस गड़ मैं आया हुआ हूँ, यहाँ के दो जिलों दुर्ग और अम्बिका पुर के अंदर कपड़ा समिति के नाम पर लाखों रूपये की लूट चल रही है ये लोग ग्रामीण इलाकों मैं जाकर जिले के लग भग सभी गाँवों से तीन हजार रूपये से लेकर छह हजार रूपये तक इकट्ठा कर रहे हैं, ये लोग पूर्व मैं भी लग भग सारे छत्तिसगड़ के सभी जिलों मैं इसी प्रकार से लूट करके भाग चुके हैं. मैं पहले भी इन लोगों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करवा चुका हूँ.
इस समय समय की कमी के चलते विस्तार से लिखना सम्भव नही है पर आप सभी को इतना बताना जरूरी है की इस सारे कार्य मैं एक पूर्व डी एस प़ी सहाब सुरेश मूलकरवार जी ( भाऊ ) एक एक लाख रूपये इन ठगों से इस कार्यों को करने देने व् पुलिस से बचाने के लिए ले रहे हैं
इस समय आप को मैं बता देना जरूरी समझता हूँ की ये डी एस प़ी सहाब मुझे किसी भी संगीन मामले मैं केवल फसाने की ही ताक़ मैं ही नही है बल्कि ये मुझे नक्सलाइट बता कर मेरा एन काउन्टर भी करवा सकता है क्योंकि मेरे कारण पहले भी इनकी नौकरी 2005 मैं खतरे मैं भी पड़ चुकी है, अगर मुझे मार दिया जाता है तो मेरा सम्पर्क आप सभी से टूट जाएगा यदि ऐसा होता है तो इसके लिए पूर्ण रूप से सुरेश मूल्करवार जी ही जिम्मेदार होंगे
हालांकि दोस्तों मेरे पास समय है की मैं यहाँ से भाग सकू मगर मुझे आसपास की जगहों से इन्हें बेनकाब करने के लिए इनके खिलाफ सबूत जुटाने हैं इसलिए मैं यहाँ से भागूंगा नही. आशा है आप सभी किसी अनहोनी की हालत मै इन लोगों को बेनकाब करने मैं मेरी मदद अवश्य करेंगे

बुधवार, 1 सितंबर 2010

अनेकता मैं एकता से ही, मेरा देश महान है,......



वन्दे मातरम दोस्तों,

ये हमारी ही जमी है, ये हमारा ही चमन है,
स्वर्ग से भी सुंदर, प्यारा ये वतन है,.......

यहाँ लहलहाते खेत, पेड़ों पर झूले सावन के,
कितने प्यारे नौनिहाल हैं, अपने आंगन के,........

यहीं पे केवल ईद मनाते, हिन्दू देखे जाते हैं,
यहीं मुसलमाँ रंग लगाते, दीप जलते हैं,........

यहीं हिमालय ऊँचा करके, खड़ा है अपने भाल को,
भारत माँ के चरण पखारते देखा, महासागर विशाल को,.........

यहीं कदम कदम पर बोलियाँ, मैं फर्क दिखाई पड़ता है,
यहीं रहीम दुश्मन से देखो, राम की खातिर लड़ता है,.......
यहाँ अमरनाथ की गुफा के देखो, मुसलमाँ रखवाले हैं,
हिन्दू मुस्लिम मिल जुल कर, यहाँ सिरडी जाने वाले हैं,..........

यहाँ लोहड़ी की रेवड़ी, सब मिल जुल कर खाते हैं,
यहाँ क़िर्समस के त्यौहार को, मिल कर सभी मनाते हैं,.......

फर्क यहाँ पहनावे मैं, कदम कदम पर आता नजर,
फर्क यहाँ पर दिलों मैं, कभी नजर ना आता मगर,............

शहीदों की ये सरजमी, प्यारा ये हिंदुस्तान है,
अनेकता मैं एकता से ही, मेरा देश महान है,...........

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

 
 
 
 
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वन्दे मातरम दोस्तों,
गाल गर बजाने से, बात अगर बन जाती,
मेहनत कर दुनिया मैं, रोटी कमाता कौन,
बातों से खेतों मैं, फसल गर होती पैदा,
जेठ की दोपहरी मैं, हल फिर चलाता कौन,
बातें ही बनाने से, महल अगर बन जाते,
मिटटी मैं मिटटी हो, गारा बनाता कौन,
बातें ही बनाने से, बदन अगर ढक जाता,
कपड़ा बनाने को, चरखा चलाता कौन,
बातें ही बनाने से, नहरें अगर खुद जाती,
जलते रेगिस्तान मैं भी, हरियाली लाता कौन,
गाल ही बजाने से, युद्ध अगर जीते जाते,
सरहद पर जाकर के, लहू फिर बहाता कौन,
गाल ही बजाते रहते, गर हमारे अमर शहीद,
सोचो भारत माँ को, आजाद कराता कौन??

बुधवार, 11 अगस्त 2010

"""रूहे शहीदा शर्मिंदा हैं"""




वन्दे मातरम दोस्तों,

आजादी खुद पर शरमाई,
वक्त ने ली कैसी अंगडाई,
रूहे शहीदा शर्मिंदा हैं,
जिन्दगी किस दौर पे आई,

क्या इसीलिए हम फांसी चढ़ गये ,
क्या यही स्वप्न हमारा था,
तुम लूट लूट कर इसको खाओ,
जो हमे जान से प्यारा था,

तुम लालकिले फहराने तिरंगा,
सुरछा गार्डों के संग आते हो,
देश की खाक हिफाजत करोगे,
अपनी जान बचा नही पाते हो,

उग्रबाद के आगे टेकते घुटने,
तुम्हे जान आन से प्यारी है,
खुद को समझते देश से ऊपर,
इसलिए ही हार तुम्हारी है,

बेबस क्यों लाल भूमि के, शत्रु क्यों हो रहा दबंग???
क्योंकि देश पे मर मिटने की अब, नेताओं मैं नही उमंग,
लाल किले पर तिरंगा, फहराओ तुम शान से,
इतना प्यार मत करो, अपनी इस जान से,
अगर मौत भी आये तो, इक मिशाल बन जाओ तुम,
तुम भारत माँ के हो सपूत, धरा गगन पर छाओ तुम,
फिर कोई रूबिया प्रकरण, दौहराया ना जो जायेगा,
उग्रवाद इस देश से, तब ही तो मिटने पायेगा,
देश द्रोही को मारने मैं, मिनट ना एक बर्बाद करो,
आजादी की खातिरफांसी चढ़ गये, इतना तो तुम याद करो,


शहीदेआजम भगत सिंह ने कहा था -‘‘भारतीय मुक्ति संग्राम तब तक चलता रहेगा जब तक मुट्ठी भर शोषक लोग अपने फायदे के लिए आम जनता के श्रम का शोषण करते रहेंगे। शोषक चाहे ब्रिटिश हों या भारतीय।

सोमवार, 9 अगस्त 2010

......बहुत दिन बीते.......



वन्दे मातरम दोस्तों,

......बहुत दिन बीते.......

थाली मैं दाल को आये हुए,
पत्नी को हरी सब्जी बनाये हुए,
खाने मै सलाद को खाए हुए,
......बहुत दिन बीते.......

रोटी का साथ देखो मक्खन ने छोड़ा,
दूध की खातिर बिटिया का दिल तोडा,
रोटी पे मक्खन लगाये हुए,
बिटिया को दूध पिलाये हुए,
साथ मैं बिस्कुट खिलाये हुए,
......बहुत दिन बीते.......

बच्चों को दिलाने गये जो कपड़े,
महगाई ने हाथ दोनों ही पकड़े,
प्रेरणा को फ्राक दिलाये हुए,
पारस को अचकन सिलाये हुए,
नंगे पैरों को जूते पहनाये हुए,
......बहुत दिन बीते.......

दोस्तों को हमसे शिकायत ये आम है,
मिलते नही प्यारे क्या इतना काम है,
दोस्तों को घर पर बुलाये हुए,
दोस्तों के घर खुद भी जाये हुए,
मिल जुल के पार्टी मनाये हुए,
......बहुत दिन बीते.......

त्योहारों की रंगत अब हो गई फीकी,
महगाई से हमने बात ये है सीखी,
ईद की सिवैयां खाए हुए,
दिवाली की मिठाई भिजवाये हुए,
किरिश्मश पे गिफ्ट दिलाये हुए,
.....बहुत दिन बीते.......

मैं जब तक नेताओं की बात नही कर लेता मेरे पेट का दर्द ठीक नही होता है ( ऐसा नही की सारे नेता ही खराब हैं मगर बहुतायत तो भ्रष्ट व अपराधिक टाइप के नेताओं का ही है ) सो उन भ्रष्ट नेताओं के लिए कुछ पंक्तियाँ..........

हम करते हैं जब भी दिखावा ही करते,
देश की हालत से फर्क हमको नही पड़ते,
गणतन्त्र दिल से मनाये हुए,
राष्ट्र गान वास्तव मैं गाये हुए,
सचमुच दिल से तिरंगा फहराए हुए,
......बहुत दिन बीते.......

जय हिंद दोस्तों

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

***देखि तेरी बाजीगरी सरकार***






वन्दे मातरम दोस्तों,
""बस एक ही उल्लू काफी है, बर्बाद गुलिस्ताँ करने को,
हर शाख पे उल्लू बैठा है, अंजामे गुलिस्ताँ क्या होगा,;;
कामन वैल्थ मैं पानी की तरह बहाया जाने वाला पैसा जो कुछ थोडा बहुत काम मैं लगेगा और अधिकांश ऊपर से लेकर नीचे तक अफसर नेता ठेकेदार के नापाक गठजोड़ से इस तिकड़ी की जेब मै जा रहा है, कामन वैल्थ के बाद कामन मैं की जेब से टेक्स के रूप मैं लिया ही जाना है इन देश के ठेकेदारों को कहाँ इस बात की चिंता है की बाड़ से करोड़ों रूपये का गेंहू नही सड़ा है बल्कि यह गेंहू जमा खोर अफसर नापाक गठजोड़ के चलते जान बूझ कर सड़ाया गया है जिससे जमाखोर मन माने रेट पर गेंहू को बेच सके. अब इस कामन वैल्थ के नाम पर दोनों हाथ से देश का धन इस तिर्मूरती द्वारा लूटा जा रहा है, मीडिया मैं खबर आने के बाद ये थोडा सा हंगामे का दिखावा तो सरकारी मशीनरी को करना ही था, मगर वास्तव मैं जिम्मेदार लोगों पर कोई कार्यवाही होनी ही नही है क्योंकि इस हमाम में सारे ही नंगे हैं, कौन किसके बारे मैं बोलेगा, कुछ दिन का दिखावा कमिशन या आयोग बनेगा और जाँच करेगा जाँच की दिशा पहले से ही तय सुदा किसी एक अफसर पर आकर रूक जाएगी उस एक अफसर को बली का बकरा बनाकर सरकार भी वाह वाही लूटेगी उसके बाद विपछ का हंगामा भी खत्म और इस देश की जनता वह तो बेहद ही भुल्लकड़ है कुछ दिन बाद उसे ही क्या याद रहना है, सो लूटने वाले भी मस्त और लुटने वाली गरीब जनता की तो नियति ही लूटना है.
***देखि तेरी बाजीगरी सरकार***
लूटती है तू नाना प्रकार,
***देखि तेरी बाजीगरी सरकार***
कीमत से ज्यादा किराया तू देती,
दोनों हाथो से दलाली तू लेती,
सब से निराला है तेरा व्यापार
***देखि तेरी बाजीगरी सरकार***

शनिवार, 31 जुलाई 2010

***अजब तेरी कारीगरी रे करतार, अजब तू खेल रचता है,***


वन्दे मातरम दोस्तों,
***अजब तेरी कारीगरी रे करतार, अजब तू खेल रचता है,
कोई फाकों पे जिन्दा है, कोई खा खा के मरता है,***
किसी के तन पे है मलमल, किसी का तन बदन नंगा,
किसी की अर्थी है डोली, कोई बे- कफन मरता है,
***अजब तेरी कारीगरी रे करतार, अजब तू खेल रचता है,***
किसी के महल अटटारे, गगन से करते हैं बातें,
कोई कमबख्त देखो रे, दो गज जमी को तरसता है,
***अजब तेरी कारीगरी रे करतार, अजब तू खेल रचता है,***
कोई सोने के चम्मच से, चाँदी के बर्तन मैं है खाता,
कोई कर कर के मर जाता, नही पर पेट भरता है,
***अजब तेरी कारीगरी रे करतार, अजब तू खेल रचता है,***
किसी को तलाश खुशियों की, यंहां हर वक्त रहती है,
किसी के अंगने मै देखो, ख़ुशी का सावन बरसता है,
***अजब तेरी कारीगरी रे करतार, अजब तू खेल रचता है,
किसी की आँख में देखो, कभी आंसू ना आते हैं,
किसी को हंसने का देखो, महज एक ख्वाव दीखता है,
***अजब तेरी कारीगरी रे करतार, अजब तू खेल रचता है,
कोई फाकों पे जिन्दा है, कोई खा खा के मरता है,***

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

आज पत्रकारिता एक व्यापार बनकर रह गई है.



वन्दे मातरम दोस्तों,
आज पत्रकारिता, व्यापार बनकर रह गई,
अच्छी बुरी हर खबर, बाजार बन कर रह गई,
अपने नफा नुकसान का, करते सदा ये आंकलन,
हर गरीब खबर एक, बेगार बन कर रह गई,
इस हाई प्रोफाइल दौर मैं, खबरें भी यारों बट गई,
इक जमी मैं दब गई, एक मीनार बन कर रह गई,
एक खबर बेकार सी, सारा जमाना जान गया,
एक गरीब लाश भी, बेकार बन कर रह गई,
पूरे दिन दिखा लोगों को, हिरोइन का नया फैशन,
एक बेवा की चीख पुकार, बीमार बन कर रह गई,

आज पत्रकारिता एक व्यापार बनकर रह गई है. सब खबरें इन चैनल मालिकों की मर्जी से ही चलती हैं, मैं एक एन जी ओ चलाता हूँ, पुलिस, पब्लिक, पत्रकारों मुजरिमों और राजनेताओं से लगातार ही पाला पढ़ता रहता है, यमुना पार ( देहली ) से सम्बन्धित अधिकतर पत्रकारों से मेरे अच्छे सम्बन्ध है, बहुत सी खबरें हमारे द्वारा ही उन तक पहुंचती हैं, बहुत सी खबरों की सत्यता के लिए ये खुद हमे घटना वाली जगह तक भेजते हैं, बहुत सी खबरें ऐसी होती हैं जो सामाजिक नजरिये से पब्लिक के सामने आनी ही चाहिए मगर न्यूज़ डेस्क पर बैठे लोग इन खबरों का स्तर जानने के बाद ही निर्णय लेते हैं की ये खबर आनी चाहिए या नही,
उदाहरन के लिए मैं बताना चाहूंगा की न्यू उस्मान पुर ( देहली ) थाना अंतर्गत एक माह मैं लग भग 7 लाशें सामने आई उन सभी के बारे मैं मैंने खुद पुलिस उपायुक्त सहित तमाम मीडिया कर्मियों को इनके बारे मैं बताया, बद किस्मती से इन लाशों मैं से अधिकतर नशेड़ियों की या लावारिश थी पुलिस ने इन लाशों का पोस्ट मार्टम कराकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली मीडिया कर्मियों को इन के मरने मैं कोई खबर ही नजर नही आई लिहाजा ये सभी मौतें गुमनामी मैं खोकर रह गई,

और एक उदाहरण बताता हूँ न्यू उस्मान पुर ( देहली ) थाना अंतर्गत ही देह व्यापर व नशे का कारोबार जोर शोर से चल रहा था हमारी एन जी ओ ने इस सबको बंद करने का प्रण किया इसके लिए हमने पुलिस और मीडिया दोनों से ही मदद मांगी मगर मीडिया को इसमें कंही कोई हाई प्रोफाइल मामला नजर नही आया पुलिस ने भी शुरू मैं तो हमारी बात पर कोई कार्यवाही करने की जहमत ही नही उठाई मगर अमित कसाना ( पत्रकार दैनिक जागरण ) द्वारा 18 जुलाई 2009 के अंक मैं इस खबर को प्रकाशित करके पुलिस महकमे मैं खलबली मचा दी और उसके बाद हमारे एरिये मैं चल रहे सभी गैर कानूनी धंधे पुलिस ने चुस्ती दिखाते हुए बंद करवा दिए, ये है वास्तव मैं मीडिया की ताकत, अब मैं पत्रकारों की मजबूरी की बात करता हूँ बहुत से मीडिया कर्मियों से मेरे दोस्ताना सम्बन्ध है मैं जब उनसे इस बात की शिकायत करता हूँ की आप हमारा सहयोग नही करते, बहुत सी खबरें जो बेहद महत्व पूर्ण हैं आप की जानकारी मैं आने के बाद भी जनता के सामने नही आ पाती हैं तो वो बताते हैं की यार हमारे हाथ मैं कुछ नही है हम खबर बना कर दे देते हैं उस खबर को चलाना या प्रकाशित करवाना हमारे हाथ मैं नही होता है, ऊपर बैठे लोगों को खबरों की जरूरत नही होती है उन्हें तो केवल हाई प्रोफाइल और सनसनी खेज खबरों की जरूरत होती है, और बहुत सी खबरों को पुलिस के आला अधिकारी ही नही चाहते हैं की वो खबरें जनता के बीच मैं पहुंचे.
दोस्त कभी पत्रकारिता मैं एक जज्बे की जूनून की जरूरत होती थी मगर अब पत्रकारिता के लिए सनसनी खेज होना जरूरी हो गया है चैनल्स टी आर प़ी के लिए हर खबर को सबसे पहले, सबसे तेज सनसनी खेज बना कर पेश करते हैं खबर का हाई प्रोफाइल होना पहली शर्त है कोई आम आदमी को इन्साफ दिलाने के लिए आगे नही आता गरीब की हत्या भी खबर नही होती और अमीर की कार भी ड़ीवाइडर से टकरा जाये तो मुख्या खबर बन जाती है यमुनापार जैसी गंदी बस्तियों मैं होने वाला बलात्कार भी खबर नही होती और लाजपत नगर या साऊथ एक्स मैं होने वाली छेड खानी भी चैनल्स पर पूरे दिन दिखाई जाती है, यमुनापार की बस्तियों मैं होने वाली लाखों की लूट पर भी चैनल्स की आँख नही खुलती और पाश कालोनी मैं किसी महिला का यदि पर्श भी चोरी हो जाये तो नमक मिर्च लगाकर उसे दिखाया जाता है आम आदमी का अपहरण कोई मायने नही रखता मगर किसी बड़े आदमी का कुत्ता भी खो जाये तो पूरे शहर के मीडिया कर्मी और पुलिस कर्मी पगलाए से उस कुत्ते के पीछे पड़ जाते हैं, सच जानिये मीडिया आज अपनी सही पहचान खोता जा रहा है आज मीडिया की पहचान एक व्यवसाय की हो कर रह गई है, आज मीडिया सच को सामने लाने का साधन ना रह कर अपने नफे नुकसान का आकलन करके कार्य करने वाला व्यापारी बन कर रह गई है. मीडिया आज यह भूल चुका है की वह सम्पूर्ण निजाम बदलने की ताकत रखता है

मंगलवार, 27 जुलाई 2010


वन्दे मातरम दोस्तों,

***सत्ता के मद में मदमस्त रहते हैं सत्ताधारी,
उन्हें कहाँ कब चिंता है जनता मरती बेचारी,**********

सुरसा के मुहं की तरह महगाई बडती जाती है
कितना भी कमाइए तनख्वाह कम पडती जाती है,
बच्चों का पेट भर जाये माँ खुद भूखी रह जाती है,
महगाई की मार फिर भी बच्चों का पेट ना भर पाती है,
ए. सी. कमरों में बैठ वो करते बजट की तैयारी,
क्यों कर वो समझ पाएंगे भूके, नंगों की लाचारी,
सत्ता के मद में मदमस्त रहते हैं सत्ताधारी,
उन्हें कहाँ कब चिंता है जनता मरती बेचारी,**********

गरीब के पिचके गाल अमीर खा खा कर के लाल हुआ,
अमीर हुआ नित नित अमीर गरीब और कंगाल हुआ,
जिसके दर्द हुआ ना कभी वो क्या समझेगा बीमारी,
जनता का दर्द कहाँ समझेगे जिन्हें नही जनता प्यारी,
सत्ता के मद में मदमस्त रहते हैं सत्ताधारी,
उन्हें कहाँ कब चिंता है जनता मरती बेचारी,**********

संघर्ष एन जी ओ: ***कंक्रीट का विशाल जंगल, बन गया ये शहर सारा***

संघर्ष एन जी ओ: ***कंक्रीट का विशाल जंगल, बन गया ये शहर सारा***